Tuesday, April 6, 2010

आज एक पुराने दोस्त ने,
दरवाजे मैं दस्तक दिया ,
दरवाजा खोला तो उसे
देख कर अचानक हे कह पड़ा ...
"आज रिहर्सल नहीं है "....
उसने कहा पार्थ मैं निखिल हूँ...
तुम्हारा दोस्त मेकेमन .....
जो नाटको मैं सब के चरित्र को
बदल देता था.....
मैं सहम गया , क्यूँ की मैं उन दिनों
मैं वापस चला गया था.....
जहाँ लोग नाटक को नाटक नाहे
"नौटंकी " कहते थे...
नाच गाना कहते थे....
पर हम उस ज़माने मैं भे नाटक किया
करते थे......
आज सब कुछ बदल गया है...
हाथो मैं ताली के जगह रिमोट
हो गया है ...हमारा
रंगमंच लोगो की बेडरूम
मै हो गया है........
पर मैं काल भे निर्देशक था
आज भी निर्देशक हूँ ....
तब मैं गली कुचो मैं नाटक
करवाता था, आज मैं प्रेक्षग्रिः
मैं नाटक करवाता हूँ.....
कल मुझे पैसे नहीं मिलते थे
पर आज पैसो के "लिए "नाटक करवाता हूं
कल मैं समाज को बदल ने का
काम करवट था...आज खुद हे समाज मैं
रह कर "बदल " रहा हूँ....
उस लिए her बार दरवाजा खोलते
हे मैं डार जाता हूँ.......

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